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संत ज्ञानेश्वर

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भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के संरक्षक अध्यात्म ज्ञान के मार्तण्ड युग पुरूष संत ज्ञानेश्वर जी की ज्ञान रश्मियों से आज भी पददलित समाज अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। इनके सन्देश से समाज मे समन्वय और भार्इचारा का भाव संचालित हो रहा है।

संत ज्ञानेश्वर का जन्म आलन्दी ग्राम में विक्रम सम्वत् 1332 भ्राद कृष्णष्टमी की मध्य रात्रि में पिता श्री विट्ठल पंत एवं धर्म परायणा माता रूकमणी के पवित्र गर्भ से द्वितीय पुत्र के रूप में हुआ था। ये चार भार्इ-बहन से थे - श्री निवृतिनाथ, संत ज्ञानेश्वर, सोपान देव और बहन मुक्त्ता बार्इ। यें कृष्ण के अवतार माने जाते थे। श्री विट्ठल पंत के पितामह यंवक पंत के गुरू नाथ सम्प्रदाय के प्रर्वत्तक गोरखनाथ थे। श्री निवृतिनाथ को नाथ सम्प्रदाय के दूसरे प्रर्वतक श्री गहिनीनाथ ने स्वप्न में दीक्षा दी थी। इनकी साधना देखकर ज्ञानदेव ने अपने बड़े भार्इ से ही दीक्षा ली थी। सौपन देव और मुक्ता बार्इ ने संत ज्ञानेदव से दीक्षा ली।

शुरू से ही इन लोगों का जीवन बड़ा कष्टमय रहा । पिता के सन्यास से पुन: गुरु आज्ञा से गृहस्थी में आने से समाज वालों ने इनका तिरस्कार किया। वहां के ब्राह्मणों ने इसके पाश्चाताप की सजा मृत्यु बतार्इ। इसीलिए इनके माता-पिता इन्हें अस्हाय अवस्था में ही छोड़कर चले गये।
मता-पिता के चले जाने के बाद चारों बच्चे इतने असहाय हो गये कि इन्हें भीख मिलनी भी कठिन हो गर्इ। न जाने कितने दिनों तक यें जंगली फल खाकर रहे। इस समस्या के निदान के लिए आगे बढ़कर पैठण के ब्राह्मणों से प्रश्न किया। वे इन्हें दुत्कारते हुए बोले-तुमलोग अपनी शुधता के लिए लज्जा त्याग कर कुत्ते और चांडालों को शाष्टांग प्रणाम करते रहना। इसी से तुम्हारे पाप दूर हो जायेंगे।

पण्डितों की इस निर्णय को सुनकर श्री निवृतिनाथ ने कहा-मै तो निवृति हूँ, प्रविृति में मेरी रूचि नहीं है मैं राजयोगी हूँ । संत ज्ञानेश्वर ने कहा-मैं सारे शास्त्रों का ज्ञाता हूँ। सौपान देव ने कहा-लोगो को भगवद् अराधना में लगाना मेरा काम है। मुक्ताबार्इ बोली-मैं तो जन्म से ही मुक्त हूँ। इन नन्हें बच्चों के मुख से इस प्रकार की बाते सुनकर सभी पंडित हतप्रत रह गये। उनमें से एक पण्डित ने कहा-यह ठीक है कि पाश्चाताप के लिए तुम्हारे माता-पिता ने मृत्यु को वरण किया पर इस बात का क्या प्रमाण है कि तुम लोग शुद्ध हो? ज्ञानदेव ने कहा-हमारा विश्वास है कि हम पूर्ण रूप से शुद्ध हैं। फिर भी आप कैसा प्रमाण चाहते हैं आज्ञा किजिए। इसी बीच में कुछ दुष्ट व्यक्तियों ने उनसे छेड़-छाड़ आरंभ कर दी। तुम्हार क्या नाम है? उत्तर मिला-ज्ञानदेव। पास ही भैसा था उसकी ओर संकेत करके एक आदमी ने इनको ताना मारा, कि यहाँ तो यही ज्ञानदेव है, बेचारा दिनभर ज्ञान का ही तो बोझा ढोया करता हैं। कहिए देवता, क्या आप ऐसे ही ज्ञानदेव हैं? ज्ञानदेव ने कहा-हाँ, इसमें संदेह ही क्या है। यह तो मेरी आत्मा है। इसमें मुझमें कोर्इ भेट नहीं है। यह सुनकर किसी ने और भी छेड़छाड़ करने के लिए भैंस की पीठ पर सटासट दो सोंटे लगा दिया। और ज्ञानदेव से पूछा की ‘ये सोंटे तो तुम्हे भी जरूर लगे होंगे ।’ ज्ञानदेव ने कहा ‘हाँ’ और अपना बदन खोलकर दिखा दिया उस पर सोंटो की चिन्ह थे। फिर किसी ने कहा-तुममे और इस भैंसे में एक ही आत्मा है, तो क्या यह भैंस भी वेद मंत्र पढेगा। इस पर ज्ञानदेव ने कहा-अवश्य पढ़ेगा। ज्ञानदेव ने चुपचाप भैंसे के पास जाकर भैंस की पीठ थपथपार्इ, और कहा हे देवता आप इन पंडितों के सामने वेद मंत्र का उच्चारण करें। अचानक भैंसा मानव की वाणी में बोल उठा- ‘‘और गायत्री महामंत्र उच्चारण करने लगे। ‘‘ऊँ भूर्भुव :स्व:तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न:प्रचोदयात्।

यह देखते ही सारे पंडित ज्ञानदेव के चरणों पर गिर पड़े और बोले-ज्ञानेदव! मान गये कि तुम सचमुच एक महानयोगी हो। तुम अवश्य ही जगत का कल्याण करोगे। यह कहकर पैठण के महा शास्त्री ने शुद्धी पत्र दे दिया, और चारों भार्इ-बहन निवास की ओर चल पडे़। रास्ते में इनलोगों ने देखा की श्मसान में एक महिला अपने पति के शव के आगे विलाप कर रही है। ज्ञानदेव का हृदय करूणा से विचलित हो उठा। आगे बढ़कर ज्ञानदेव ने प्रश्न किया-क्या बात है? उसमे से एक व्यक्ति ने बताया कि इस महिला के पति सच्चिदानन्द की मृत्यु हो गर्इ है। ज्ञानदेव ने निवृत्तिनाथ से कहा-गुरुदेव, क्या सत चित आनन्द की मृत्यु हो सकती है?

गुरुदेव ने कहा-नहीं संत्चित आनन्द की मृत्यु नहीं हो सकती। गुरु की बात सुनकर ज्ञानदेव मृतक के माथे पर हाथ फेरते हुए बोले-उठो सच्चिदानन्द! तुम्हारी मृत्यु नहीं हुर्इ हैं। इतना कहते ही वह व्यक्ति उठ बैठा। आगे चलकर उसने ज्ञानदेव से दीक्षा भी ली।

ज्ञानदेव में योग की अद्भूत चमत्कार बचपन से था। एक बार भिक्षा माँगकर लौटे और घर पर रोटी बनाने के लिए न ही बर्तन था और न ही आग था पड़ोसी उन चारों से घृणा रखते थे। रोटी बनाये तो कैसे? भूख से चारों भार्इ-बहन तड़प रहे थे। उसी समय मुक्ताबार्इ ने ज्ञानदेव से कहा-भैया न आग है और न बर्तन तो रोटी कैसे बनार्इ जाय। तब ज्ञानदेव ने अपनी पीठ दिखाते हुए मुक्ताबार्इ से कहा-लो बहन मेरी पीठ पर रोठी बना ले और देखते ही देखते रोटी बन गर्इ।

बड़े भार्इ निवृत्तिनाथ की आज्ञा से श्रीमद् भागवत पर टीका लिखनी शुरू की। पूरे नौ सौ श्लोकों में उन्होंने ज्ञानेश्वरी लिखी। इसका प्रचार जगत जगत में फैल गया। उस समय उनकी आयु मात्र पन्द्रह वर्ष की थी। एक योगी चांगदेव जिसकी आयु 14 वर्ष थी, उन की चारो बहन-भाइयों से मिलने की इच्छा हुर्इ। कहा जाता था कि वे चौहद वर्षों से योग साधना करते आ रहे थे। चांगदेव ने सोचा की उनलोगों की सिद्धार्इ की प्रमाणिकता जानने के लिए पहले एक पत्र लिखूँ कागज-कलम लेकर व सोचने लगे कि कौन-सा संबोधन उचित रहेगा। तीर्थ स्वरूप। ‘पिताजी’ लिखूँ या चिरंजीव (पुत्र) यह ठीक है कि उम्र में मैं काफी बड़ा हूँ, पर साधना के क्षेत्र में कौन बड़ा है, इसका क्या पता है? इसी उहापोह में उन्होंने बिना कुछ लिखे सादे कागज को ही भेज दिया। पत्र वाहक ने कागज ज्ञानदेव को दिया। वे उसक देखकर हैंस पड़े। मुक्ताबार्इ ने उसे देखा तो वह खिल-खिलाकर हैंस पड़ी और बोली- चौदह वर्ष तक तपस्या करने के बाद भी इस कागज की तरह कोरे ही रह गये! इस व्यंग्य को सुनकर निवृतिनाथ चौंक पडे़। कहीं चांगदेव इस बात को सुनकर नाराज न हो जायें, इसलिए पत्रवाहक से कहा, आप इस वाचाल लड़की की बातो पर ध्यान न दें। हम भी इस महान योगी से मिलने के लिए आतुर हैं। हमारा आग्रह है कि चांगदेव महाराज अपने चरण-रज से हमारी कुटिया को पवित्र करें।

निवृत्तिनाथ का संदश पाते ही चांगदेव अपने योग प्रभाव दिखाने के लिए एक सिंह पर सवार होकर, हाथ में एक सर्प चाबुक लिये हुए अपने शिष्यों के साथ चल पड़े। उस समय ज्ञानदेव अपने भार्इ-बहन के साथ एक दीवापर पर बैठे थे। चांगदेव के आगमन का समाचार सुनकर उन्होंने सोचा कि आगे बढ़कर उनका स्वागत करना चाहिए। पास में कोर्इ सवारी नहीं थी इसलिए उस दीवार को ही आज्ञा दी, हे प्रिय दीवार। जरा तू एक योगी के स्वागत में चलकर उनका यथोचित सत्कार करे। दीवार सक्रिय हो गर्इ, और चांगदेव के स्वागत के लिए चल पड़ी।

उस दृश्य को देखकर चांगदेव हत्प्रभ हो गये। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि भले ही उम्र में मैं बड़ा हूँ, पर साधना में ज्ञानदेव मुझसे श्रेष्ठ है। तुरंत सिंह से उतरकर उन्होंने ज्ञानदेव को साष्टांग प्रणाम किया, देर रात तक सभी भार्इ-बहनों के साथ सत्संग वार्ता होती रही। फिर भोजन के बाद शयन की बारी आयी। चांगदेव के सामने एक समस्या खड़ी हुर्इ कि उसका सिंह कहाँ बाँधा जाये, समस्या का निदान करते हुए ज्ञानदेव बोले इसे गौशाले में बाँध देना चाहिए। चौकते हुए चांगदेव बोल पड़े कहीं यह गायों को खा न जाये। ज्ञानदेव बोले-कोर्इ बात नहीं। यह भी तो हमारा अतिथि ही है, इसलिए खाने को इंतजाम होना चाहिए। दूसरे दिन मुक्ताबार्इ स्नान-घर में स्नान कर रही थीं। उसी निर्वस्त्र अवस्था में मुक्ताबार्इ ने चांगदेव से अपना वस्त्र माँग लिया, चाँगदेव लज्जा के मारे चेहरा झुकाते हुए वस्त्र देने गए। उन्हें देखकर मुक्ताबार्इ उनकी दाढ़ी पकड़कर बोली-’क्यों, ठंढ़ा हो गया सब ब्रह्मज्ञान? चौदह सौ वर्ष की सब तपस्या हवा हो गर्इ? इतने वर्षों की तपस्या के बावजूद क्या स्त्री-पुरूष का भेद नहीं गया? अभी तक देह-भावना बची हुर्इ है? यह देह आत्मा के रहने का घर ही तो है। सब इन्द्रियाँ उस घर की खिड़कियाँ हैं, जिन्हें भगवान ने हवा, पानी और भोजन डालने के लिए ही तो बनाया है, फिर खिड़की खुली हो अथवा बंद, क्या फर्क पड़ता है?

चांगदेव शर्म के मारे पानी-पानी हो गये। उनका सारा ज्ञान 15 वर्ष की तपस्विनी के आगे हवा हो गया। उसी समय चांगदेव ने अध्यात्म संबंधी पैंसठ प्रश्न किये, जिनका उत्तर फटाफट मुक्ताबार्इ ने उसी हालत में दिया।

कुछ देर बाद चांगदेव ने चलने की आज्ञा माँगी। उनकी सवारी के लिए सभी गौशाला में गये, परंतु वहाँ तो सिंह था ही नहीं। ज्ञानदेव बोले कहीं गाय सिंह को खा तो नहीं गर्इ? चांगदवे आश्चर्यचकित होकर बोंल पड़े-’’कैसी बाते करते है महाराज! सिंह गायों को खा सकता है पर गाय भला सिंह को कैसे खायेगी? चांगदेव उदास होने लगे। ज्ञानदेव ने एक गाय को थपथपाते हुए कहा - माँ लौटा दो बेचारे योगी की सवारी। गाय ने जोर की छींक मारी और उनकी नाक से सिंह निकल पड़ा, योगी जी उन्हें प्रणामकर चलते बने।

संत ज्ञानदेव के दक्षिण भारत में भक्ति की गंगा से लोगो को आनंदित करते हुए कुल इक्कीस वर्ष, तीन मास पाँच दिन की अवस्था में सम्व्त 1353 मार्गशीर्ष कृष्णा 13 को जीवित समाधि ही ले ली। भारतवर्ष के महान संत ज्ञानदेव का संसार के रंगमंच से तो पटाक्षेप हो गया, पंरतु अभी लाखों लोगों को उनके ज्ञान से जीवन संवर रहा है।

विश्व-स्तरीय संतमत सत्संग समिति (रजि.)